राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020: मातृभाषा में शिक्षण से मुक्त होगी गुलामी की मानसिकता”अखिल भारतीय राष्ट्रीय शैक्षिक महासंघ उत्तराखंड इकाई के तत्वावधान में पिथौरागढ़ जनपद के बलुवाकोट धारचूला रोड़ द्वारा सम्पन्न हुआ ऑनलाइन राष्ट्रीय सेमिनार – पिथौरागढ़।अखिल भारतीय राष्ट्रीय शैक्षिक महासंघ उत्तराखंड इकाई के तत्वावधान में पिथौरागढ़ जनपद के सौजन्य से राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में मातृभाषा की प्राथमिकता और महत्व विषय पर एक गरिमामय एवं वैचारिक रूप से समृद्ध शैक्षिक कार्यक्रम का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में देश के प्रतिष्ठित शिक्षाविदों, नीति-चिंतकों और शिक्षकों ने भाग लेते हुए मातृभाषा, क्षेत्रीय भाषाओं और भारतीय भाषाओं की भूमिका पर गंभीर विमर्श किया।कार्यक्रम के विशिष्ट अतिथि प्रो. मानस पांडे, पूर्व कार्यकारी उपाध्यक्ष, भारतीय वाणिज्य संघ, ने अपने संबोधन में भाषा को केवल संप्रेषण का माध्यम न मानकर ज्ञान, संस्कृति और राष्ट्रीय चेतना का मूल आधार बताया। उन्होंने राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के संदर्भ में भाषा की प्राथमिकता को रेखांकित करते हुए कहा कि मातृभाषा में शिक्षा से विद्यार्थी की बौद्धिक क्षमता, सृजनशीलता और आत्मविश्वास का सर्वांगीण विकास होता है। प्रो. पांडे ने यह भी स्पष्ट किया कि बहुभाषिकता भारत की शक्ति है और शिक्षा में भाषाई समावेशन राष्ट्रीय एकता को सुदृढ़ करता है।*कार्यक्रम के मुख्य अतिथि माननीय प्रो. नवीन चंद्र लोहनी जी, कुलपति, उत्तराखंड मुक्त विश्वविद्यालय-* मुख्य अतिथि माननीय प्रो. नवीन चंद्र लोहनी, कुलपति, उत्तराखंड मुक्त विश्वविद्यालय, ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के मूल भाव को रेखांकित करते हुए कहा कि प्राथमिक स्तर से लेकर उच्च शिक्षा तक मातृभाषा एवं क्षेत्रीय भाषा में शिक्षण समय की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि सीखने की भाषा वही होनी चाहिए जिसमें विद्यार्थी सहज रूप से सोच और अभिव्यक्ति कर सके। प्रो. लोहनी ने भारतीय भाषाओं, क्षेत्रीय बोलियों और शास्त्रीय भाषाओं के संरक्षण एवं संवर्धन पर बल देते हुए कहा कि सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी (ICT) के माध्यम से भाषाओं को सशक्त बनाया जा सकता है। उन्होंने यह भी कहा कि जो भाषाएं लुप्तप्राय हो चुकी हैं, उनके पुनर्जीवन के लिए शैक्षणिक संस्थानों को सक्रिय भूमिका निभानी होगी।माननीय मुख्य अतिथि जी ने यह भी स्पष्ट किया कि बहुभाषिक शिक्षा केवल अकादमिक आवश्यकता नहीं, बल्कि सांस्कृतिक उत्तराधिकार को सुरक्षित रखने का माध्यम है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति स्पष्ट रूप से मातृभाषा को बढ़ावा देने की बात करती है और इसके प्रभावी क्रियान्वयन से शिक्षा की गुणवत्ता में गुणात्मक सुधार संभव है।इसके पश्चात अखिल भारतीय राष्ट्रीय शैक्षिक महासंघ की महामंत्री डॉ. गीता भट्ट, दिल्ली विश्वविद्यालय, ने संगठन की वैचारिक भूमिका और शैक्षिक योगदान पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के निर्माण एवं समर्थन में महासंघ की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही है, और वर्ष 2015 से महासंघ शिक्षा, शिक्षक और समाज को जोड़ने का कार्य निरंतर कर रहा है। डॉ. भट्ट ने राधाकृष्णन समिति की रिपोर्ट का उल्लेख करते हुए कहा कि यदि 1950 के दशक में ही मातृभाषा और क्षेत्रीय भाषाओं को शिक्षा में पूर्ण रूप से लागू किया गया होता, तो आज की शैक्षिक स्थिति कहीं अधिक सुदृढ़ होती।उन्होंने वर्तमान समय को मातृभाषा में पुस्तक लेखन, शोध और शिक्षण सामग्री के विस्तार का समय बताया और LSRW (Listening, Speaking, Reading, Writing) प्रक्रिया को मातृभाषा में सुदृढ़ करने की आवश्यकता पर बल दिया। डॉ. भट्ट ने कहा कि यदि क्षेत्रीय भाषाओं को वास्तव में आगे बढ़ाना है, तो सभी को साथ लेकर चलना होगा और समावेशी विकास की दिशा में कार्य करना होगा।कार्यक्रम में महासंघ के उपाध्यक्ष महेंद्र जी भाई साहब के संदेश द्वारा आशीर्वचन प्राप्त हुआ। वहीं अध्यक्षीय उद्बोधन आभासी माध्यम से संदेश द्वारा प्रो. अतुल जोशी, अध्यक्ष एवं डीन कुमाऊं विश्वविद्यालय, नैनीताल, द्वारा दिया गया। उन्होंने अपने संदेश में राष्ट्रीय शिक्षा नीति को भारतीय शिक्षा परंपरा से जोड़ते हुए इसे भविष्य की दिशा बताने वाला दस्तावेज बताया।कार्यक्रम का संचालन प्रो. एच. सी. पुरोहित, डीन दून विश्वविद्यालय, देहरादून, द्वारा प्रभावी एवं संयमित ढंग से किया गया। उन्होंने समस्त वक्ताओं के विचारों को तारतम्य में प्रस्तुत करते हुए कार्यक्रम को सारगर्भित बनाए रखा।कार्यक्रम का समापन शांति मंत्र के साथ हुआ, जिसका सस्वर पाठ डॉ. डी.एस. नेगी, राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय, गोपेश्वर (चमोली) द्वारा किया गया, जिससे पूरे वातावरण में वैदिक शांति और बौद्धिक गरिमा का संचार हुआ।बौद्धिक व्याख्यान के उपरांत धन्यवाद ज्ञापन डॉ. चंद्रकांत तिवारी, राजकीय महाविद्यालय, बलुवाकोट (धारचूला रोड), पिथौरागढ़, द्वारा प्रस्तुत किया गया। उन्होंने मुख्य अतिथि, विशिष्ट अतिथि, सभी वक्ताओं, आयोजकों और सहभागियों के प्रति आभार व्यक्त करते हुए कहा कि इस प्रकार के विमर्श राष्ट्रीय शिक्षा नीति के सफल क्रियान्वयन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।इस प्रकार पिथौरागढ़ जनपद, अखिल भारतीय राष्ट्रीय शैक्षिक महासंघ उत्तराखंड इकाई के तत्वावधान में आयोजित यह कार्यक्रम भाषा, शिक्षा और राष्ट्रीय चेतना के समन्वय का एक उत्कृष्ट उदाहरण बनकर सामने आया, जिसमें मातृभाषा और भारतीय भाषाओं को गुलामी से मुक्त, शिक्षा के केंद्र में लाने का सशक्त संदेश दिया गया।


