डॉ. आशीष रतूड़ी “प्रज्ञेय” का विशेष लेख : गुरुदेव टैगोर और भारत की सांस्कृतिक चेतना

News Desk
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डॉ. आशीष रतूड़ी, “प्रज्ञेय” समन्वयक, राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP), डॉल्फिन (पी.जी.) महाविद्यालय, देहरादून गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर : 165वीं जयंती पर उत्तराखण्ड की वादियों से एक स्मरणभारत की सांस्कृतिक चेतना में कुछ व्यक्तित्व ऐसे होते हैं, जो समय की सीमाओं से परे जाकर सदियों तक जीवित रहते हैं। गुरुदेव रविंद्र नाथ टैगोर उन्हीं अमर विभूतियों में से एक हैं। उनकी 165वीं जयंती पर जब पूरा देश उन्हें श्रद्धापूर्वक स्मरण कर रहा है, तब उत्तराखण्ड की हिमालयी वादियाँ भी मानो उनकी स्मृतियों से पुनः आलोकित हो उठती हैं। टैगोर केवल एक कवि नहीं थे; वे प्रकृति, मानवता, शिक्षा और आध्यात्मिकता के ऐसे द्रष्टा थे, जिन्होंने भारत को विश्व के सामने एक नई सांस्कृतिक पहचान दी। उनकी कविता में नदी बहती है, बादल गाते हैं, पेड़ संवाद करते हैं और मनुष्य सम्पूर्ण सृष्टि से जुड़ता हुआ दिखाई देता है। शायद यही कारण था कि हिमालय की शांत, गंभीर और आत्मीय वादियाँ उन्हें बार-बार अपनी ओर आकर्षित करती रहीं।बीसवीं शताब्दी के आरम्भिक वर्षों में गुरुदेव उत्तराखण्ड के कुमाऊँ क्षेत्र, विशेषकर रामगढ़ और अल्मोड़ा आए। उस समय उनकी पुत्री रेणुका अस्वस्थ थीं और चिकित्सकों ने पर्वतीय जलवायु में रहने की सलाह दी थी। किंतु यह यात्रा केवल स्वास्थ्य-लाभ तक सीमित नहीं रही; हिमालय ने गुरुदेव के भीतर के कवि और चिंतक को गहराई से स्पर्श किया। रामगढ़ की ऊँची पहाड़ियों से दिखाई देने वाली हिमालय की श्वेत चोटियाँ, देवदार और बाँज के वृक्षों के बीच बहती हवा, और प्रकृति का शांत वातावरण इन सबने टैगोर को एक अद्भुत आत्मिक शांति प्रदान की। कहा जाता है कि वे घंटों हिमालय को निहारते रहते थे। प्रकृति उनके लिए केवल दृश्य नहीं थी; वह एक जीवित चेतना थी। आज भी रामगढ़ में स्थित “टैगोर टॉप” उनकी स्मृतियों को संजोए हुए है। यह वही स्थान माना जाता है जहाँ बैठकर गुरुदेव ने प्रकृति के साथ अपने गहन संवाद को अनुभव किया।गुरुदेव के साहित्य में प्रकृति केवल पृष्ठभूमि नहीं, बल्कि एक जीवित पात्र के रूप में उपस्थित रहती है। उत्तराखण्ड प्रवास के दौरान उनके भीतर प्रकृति के प्रति जो आत्मीयता विकसित हुई, उसने उनकी रचनात्मक दृष्टि को और व्यापक बनाया। हिमालय की निस्तब्धता ने उन्हें मनुष्य और ब्रह्मांड के संबंध को नए ढंग से समझने का अवसर दिया। टैगोर मानते थे कि प्रकृति मनुष्य को विनम्र बनाती है और उसके भीतर की अशांति को शांत करती है। यही विचार आगे चलकर उनके शिक्षा-दर्शन में भी दिखाई देता है, जहाँ वे खुली प्रकृति के बीच सीखने की बात करते हैं। शांतिनिकेतन की कल्पना में भी कहीं न कहीं हिमालय से प्राप्त वही आत्मिक अनुभव छिपा हुआ प्रतीत होता है।उत्तराखण्ड की साहित्यिक स्मृतियों में एक अत्यंत महत्वपूर्ण प्रसंग महादेवी वर्मा और टैगोर से जुड़ा है। हिन्दी साहित्य की महान कवयित्री महादेवी वर्मा जब 1933 में शांतिनिकेतन पहुँचीं, तब उनकी भेंट गुरुदेव से हुई। उसी दौरान टैगोर ने उनसे रामगढ़ और कुमाऊँ की नैसर्गिक सुंदरता का अत्यंत भावपूर्ण वर्णन किया। गुरुदेव के शब्दों में वर्णित हिमालय महादेवी वर्मा के मन में बस गया। अगले वर्षों में जब वे बद्रीनाथ यात्रा से लौट रही थीं, तब उन्होंने रामगढ़ में कुछ समय बिताया। यहाँ की प्रकृति ने उन्हें इतना गहराई से प्रभावित किया कि उन्होंने 1936 में वहीं एक भवन खरीदा और उसका नाम “मीरा कुटीर” रखा। महादेवी वर्मा ने अपने संस्मरणों और रचनाओं में हिमालय को करुणा, संवेदना और मौन सौंदर्य की भूमि के रूप में चित्रित किया। उनकी प्रसिद्ध कृति दीपशिखा भी रामगढ़ में ही लिखी गई मानी जाती है। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि टैगोर ने जिस हिमालय को अपनी आत्मा से महसूस किया, उसी हिमालय को महादेवी वर्मा ने अपनी संवेदनाओं में रूपायित किया। दोनों साहित्यकारों के बीच प्रकृति एक अदृश्य सेतु बनकर उपस्थित रही।उत्तराखंड के कई स्थान केवल एक पर्वतीय ग्रामीण आवासीय क्षेत्र नहीं, बल्कि भारतीय साहित्य की एक जीवित स्मृति है। यहाँ टैगोर, महादेवी वर्मा, सुमित्रानंदन पंत , रामधारी सिंह, नागार्जुन और अज्ञेय जैसे साहित्यकारों ने प्रकृति के बीच बैठकर अपनी रचनात्मकता को नया आयाम दिया। आज भी मीरा कुटीर और टैगोर टॉप सिर्फ़ पर्यटन स्थल नहीं हैं; वे भारतीय साहित्य की आत्मा से जुड़े तीर्थ हैं। वहाँ पहुँचकर ऐसा लगता है जैसे पर्वतों से सिर्फ़ सरिताओं का ही नहीं साहित्य की सरिता का भी उद्गम होता है ।आज जब दुनिया तकनीक और कृत्रिम बुद्धिमत्ता के युग में प्रवेश कर चुकी है, तब टैगोर की विचारधारा और भी अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है। उन्होंने शिक्षा को केवल नौकरी प्राप्त करने का माध्यम नहीं माना, बल्कि मनुष्य को संवेदनशील और रचनात्मक बनाने का साधन समझा। नई शिक्षा नीति 2020 में बहुविषयक शिक्षा, कला-संवेदन, प्रकृति आधारित अधिगम और भारतीय ज्ञान परंपरा की जो बात की गई है, उसमें टैगोर की दृष्टि स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। वे विज्ञान और साहित्य, परंपरा और आधुनिकता, प्रकृति और मानवता — इन सबके बीच संतुलन स्थापित करने वाले चिंतक थे।गुरुदेव की 165वीं जयंती केवल एक महान साहित्यकार को याद करने का अवसर नहीं है; यह उस भारत को स्मरण करने का क्षण भी है, जो प्रकृति से प्रेम करता था, संवेदनाओं में जीता था और मानवता को सबसे बड़ा धर्म मानता था। उत्तराखण्ड की वादियों में जब आज भी बादल धीरे-धीरे पहाड़ों को छूते हैं, देवदारों के बीच हवा गूँजती है और हिमालय शांत खड़ा दिखाई देता है, तब ऐसा लगता है मानो गुरुदेव अब भी वहीं कहीं बैठे प्रकृति से संवाद कर रहे हों। उनकी अमर पंक्तियाँ आज भी मानवता को दिशा देती हैं — “जहाँ मन भय से मुक्त हो और मस्तक ऊँचा हो…” गुरुदेव को उनकी 165वीं जयंती पर विनम्र श्रद्धांजलि।

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