देवभूमि उत्तराखंड में क्यों नहीं होता गणपति विसर्जन? ‘खोली के गणेश’ से जुड़ी है खास लोकमान्यता, जानिए पूरी कहानी”

News Desk
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लोकजन एक्सप्रेस उत्तराखंड: उत्तराखंड में क्यों नहीं किया जाता गणपति जी का विसर्जन? जानिए धार्मिक मान्यता देश के कई हिस्सों में गणेश चतुर्थी के बाद भगवान गणेश की प्रतिमा का विसर्जन करने की परंपरा है, लेकिन उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्रों में पारंपरिक रूप से गणपति विसर्जन का चलन बहुत सीमित रहा है। इसके पीछे स्थानीय लोकमान्यताओं और देवपरंपराओं को प्रमुख कारण माना जाता है।

उत्तराखंड को माना जाता है गणेश जी की जन्म भूमि स्थानीय धार्मिक मान्यता के अनुसार उत्तरकाशी का डोडीताल क्षेत्र भगवान गणेश की जन्मस्थली माना जाता है। इसी कारण कई लोग गणेश जी को यहां अतिथि के रूप में बुलाकर विदा करने के बजाय अपने क्षेत्र के स्थायी देवता के रूप में पूजने की परंपरा को महत्व देते हैं। यह एक लोक-धार्मिक मान्यता है, जिसे सभी धार्मिक परंपराएं समान रूप से ऐतिहासिक तथ्य के रूप में स्वीकार करती हों, ऐसा जरूरी नहीं है।

‘खोली के गणेश’ की परंपरागढ़वाल के पारंपरिक घरों में गणेश जी को घर के मंगलकर्ता और रक्षक देवता के रूप में स्थायी रूप से प्रतिष्ठित करने की लोकपरंपरा रही है। स्थानीय बोली में घर की खिड़की को ‘खोली’ कहा जाता है और इसी से जुड़ी ‘खोली के गणेश’ की परंपरा का उल्लेख मिलता है। इसलिए प्रतिमा को जल में विसर्जित करने के बजाय उसकी निरंतर पूजा की भावना रही है।

गणपति को ‘स्थायी देवता’ मानने की भावनामहाराष्ट्र आदि क्षेत्रों में गणेश उत्सव के दौरान भगवान गणेश को कुछ दिनों के लिए घर या पंडाल में आमंत्रित कर फिर विसर्जन के माध्यम से विदाई देने की परंपरा लोकप्रिय है। वहीं उत्तराखंड की पारंपरिक देव संस्कृति में गणेश जी की पूजा कई स्थानों पर स्थायी देवता के रूप में होती रही है।

पर्यावरण और हिमालयी जलस्रोतों का भी सवालउत्तराखंड में नदियां और जलस्रोत धार्मिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। प्रतिमा विसर्जन से जलस्रोतों में मूर्ति के अवशेष पहुंचने को लेकर पर्यावरण और धार्मिक भावनाओं से जुड़े सवाल भी उठते रहे हैं। हाल ही में हल्द्वानी में नदी-नालों और जलस्रोतों में गणेश प्रतिमा विसर्जन को लेकर स्पष्ट नीति बनाने की मांग भी सामने आई है।

क्या उत्तराखंड में गणपति विसर्जन बिल्कुल नहीं होता?

ऐसा कहना सही नहीं होगा। आज देहरादून, हल्द्वानी और अन्य शहरों में गणेश उत्सव मनाने वाली कई समितियां विसर्जन भी करती हैं, जबकि कुछ समितियां प्रतिमा का विसर्जन न करने और उसे मंदिर या पंडाल में रखने का निर्णय लेती हैं। इसलिए यह कहना अधिक उचित है कि उत्तराखंड की पारंपरिक पहाड़ी लोकसंस्कृति में गणपति विसर्जन व्यापक पुरानी परंपरा नहीं रही, लेकिन वर्तमान समय में अलग-अलग स्थानों पर अलग-अलग परंपराएं देखने को मिलती हैं।

धार्मिक दृष्टि से सबसे महत्वपूर्ण बात यही है कि गणेश पूजा और विसर्जन की परंपराएं क्षेत्र, परिवार और संप्रदाय के अनुसार अलग हो सकती हैं। महाराष्ट्र आदि में प्रचलित विसर्जन की परंपरा भी धार्मिक रूप से स्थापित है; इसलिए उत्तराखंड की स्थानीय परंपरा को समझते समय इसे ‘सही बनाम गलत’ के रूप में देखने के बजाय क्षेत्रीय लोकाचार के अंतर के रूप में देखना बेहतर है।

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