उत्तराखंड आयुर्वेद विश्वविद्यालय एक बार फिर चर्चाओं में है। विश्वविद्यालय के कुलसचिव डॉ. शिवकुमार बरनवाल का एक पत्र सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है, जिसमें उन्होंने कुलपति से कुलसचिव के पद से मुक्त किए जाने का अनुरोध किया है। पत्र में प्रशासनिक दबाव, लंबित जांच, छात्रों के विरोध, कर्मचारियों की कमी और कई गंभीर अनियमितताओं का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा है कि ऐसी परिस्थितियों में वे मानसिक और शारीरिक रूप से परेशान हैं।
कुलसचिव ने कहा- मेरा कैरियर प्रभावित नहीं होना चाहिए
डॉ. शिवकुमार बरनवाल ने अपने पत्र में कहा है कि मौजूदा परिस्थितियों में विश्वविद्यालय के हित में किसी अन्य सक्षम अधिकारी को कुलसचिव की जिम्मेदारी दी जानी चाहिए। उन्होंने स्पष्ट तौर पर अनुरोध किया है कि उन्हें कुलसचिव के अतिरिक्त प्रभार से मुक्त किया जाए, ताकि उनका कैरियर प्रभावित न हो। पत्र में उन्होंने विश्वविद्यालय में सामने आ रही विभिन्न प्रशासनिक और कानूनी परिस्थितियों का उल्लेख करते हुए कहा है कि इन परिस्थितियों में उनके लिए अपने दायित्वों का निर्वहन सहज तरीके से करना मुश्किल हो रहा है।

जहां सर्जन की जरूरत, वहां फिजिशियन काम नहीं कर सकता’: कुलसचिव
कुलसचिव ने पत्र में लिखा कि जहां सर्जन की जरूरत है, वहां फिजिशियन काम नहीं कर सकता। यही लाइन अब विश्वविद्यालय की कार्यप्रणाली को लेकर नई बहस का कारण बन गई है। सवाल उठ रहा है कि आखिर कुलसचिव ने विश्वविद्यालय की मौजूदा स्थिति को ‘सर्जरी’ की जरूरत वाली स्थिति क्यों बताया? क्या विश्वविद्यालय में ऐसी व्यवस्थागत समस्याएं हैं, जिनके लिए कठोर और निर्णायक कार्रवाई की जरूरत है?
2018 से 2023 बैच के छात्रों का भी जिक्र
पत्र में वर्ष 2018 से 2023 बैच के उन छात्रों का भी उल्लेख किया गया है, जिन्हें कथित तौर पर काउंसलिंग के नाम पर प्रवेश दिया गया था। कुलसचिव के अनुसार, इन छात्रों की ओर से घर पर प्रदर्शन और आत्महत्या के प्रयास जैसी घटनाएं किए जाने की बात सामने आई है। उन्होंने लिखा है कि इन घटनाओं के कारण वे मानसिक रूप से बेहद विचलित हैं। उन्होंने कुछ कॉलेजों और वहां के कर्मचारियों के कथित कृत्यों को विश्वविद्यालय और सरकार की बदनामी का कारण बताया है। पत्र में यह भी आरोप लगाया गया है कि इन मामलों में अब तक विवि स्तर पर प्रभावी निर्णय या कार्रवाई नहीं हुई है।
हाईकोर्ट की टिप्पणी का दिया हवाला
कुलसचिव ने पत्र में सतर्कता जांच लंबित होने का भी उल्लेख किया है। उन्होंने वर्ष 2018 के मामले का जिक्र करते हुए कहा है कि इस मामले में हाईकोर्ट की ओर से कई टिप्पणियां की गई हैं और मामला पीआईएल में तब्दील हो चुका है। उनका कहना है कि जब तक इन मामलों पर अंतिम निर्णय नहीं होता, तब तक छात्रों की ओर से मानकों के विरुद्ध कोई अवांछित कदम उठाए जाने की आशंका बनी हुई है। उन्होंने स्थिति को ‘एक तरफ कुआं और दूसरी तरफ खाई’ बताते हुए अपनी चिंता जाहिर की है।
परीक्षा और परिणाम को लेकर जताई चिंता
पत्र में कुलसचिव ने परीक्षा और परिणाम से जुड़े फैसलों को लेकर भी गंभीर कानूनी पेच की बात कही है। उनके अनुसार, यदि परीक्षा परिणाम घोषित किए जाते हैं, परीक्षाएं कराई जाती हैं या अंतिम परिणाम जारी किए जाते हैं, तो वे भी संबंधित मानकों के दायरे में आ सकते हैं। कुलसचिव ने पत्र में ऐसी स्थिति में कानूनी जोखिम की आशंका जताई है। यही वजह है कि उन्होंने मौजूदा परिस्थितियों में किसी अन्य सक्षम अधिकारी को जिम्मेदारी सौंपने की मांग की है।


