डॉ. सुनील अग्रवाल का सवाल—जब संबद्धता का नवीनीकरण ही समय पर नहीं, तो हर साल जीएसटी सहित शुल्क वसूलने का औचित्य क्या?
लोकजन एक्सप्रेस | देहरादून। उत्तराखंड की उच्च शिक्षा व्यवस्था में निजी एवं अशासकीय संस्थानों की समस्याओं को लेकर एक बार फिर सवाल खड़े हो गए हैं। निजी कॉलेज एसोसिएशन उत्तराखंड के अध्यक्ष एवं अखिल भारतीय विश्वविद्यालय महाविद्यालय एसोसिएशन के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष डॉ. सुनील अग्रवाल ने श्रीदेव सुमन उत्तराखंड विश्वविद्यालय की संबद्धता विस्तार शुल्क संबंधी व्यवस्था पर आपत्ति जताते हुए कहा कि जब संस्थानों को वर्षों से संबद्धता विस्तार के पत्र नहीं मिल रहे हैं, तो उनसे प्रतिवर्ष संबद्धता शुल्क और उस पर 18 प्रतिशत जीएसटी वसूलने की व्यवस्था कितनी न्यायसंगत है?
डॉ. अग्रवाल के अनुसार, विश्वविद्यालय ने 24 अक्टूबर को जारी आदेश में अशासकीय एवं निजी स्ववित्तपोषित संस्थानों को परंपरागत और व्यावसायिक पाठ्यक्रमों के लिए प्रति पाठ्यक्रम 5,000 रुपये प्रक्रिया शुल्क तथा 50,000 रुपये संबद्धता शुल्क जमा करने के निर्देश दिए हैं। 18 प्रतिशत जीएसटी जोड़ने के बाद प्रति पाठ्यक्रम कुल राशि 59,000 रुपये हो जाती है।
ऐसे में यदि किसी संस्थान में 10 पाठ्यक्रम संचालित हैं, तो उसे प्रतिवर्ष 5.90 लाख रुपये जमा करने होंगे।उन्होंने बताया कि डिप्लोमा पाठ्यक्रमों के लिए अशासकीय एवं निजी स्ववित्तपोषित संस्थानों से प्रति पाठ्यक्रम प्रतिवर्ष जीएसटी सहित 29,500 रुपये तथा राजकीय कॉलेजों से परंपरागत एवं व्यावसायिक पाठ्यक्रमों के लिए प्रति पाठ्यक्रम 11,800 रुपये जमा कराने का प्रावधान बताया गया है।
वर्षों से संबद्धता विस्तार लंबित, फिर भी शुल्क की नियमित मांग
डॉ. अग्रवाल ने कहा कि एसोसिएशन के संज्ञान में ऐसे अनेक निजी संस्थान हैं, जिन्हें वर्ष 2019 के बाद से संबद्धता विस्तार के पत्र प्राप्त नहीं हुए हैं। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब संबद्धता विस्तार की प्रक्रिया समयबद्ध तरीके से पूरी नहीं हो रही, तो संस्थानों पर प्रतिवर्ष शुल्क जमा करने का आर्थिक दबाव क्यों बनाया जा रहा है?उन्होंने कहा कि क्या विश्वविद्यालय की जिम्मेदारी केवल शुल्क वसूलने तक सीमित है, या संस्थानों को समय पर संबद्धता विस्तार उपलब्ध कराना भी उसकी जवाबदेही है? उच्च शिक्षा का संचालन केवल आदेश जारी करने और शुल्क निर्धारित करने से नहीं हो सकता। इसके लिए पारदर्शी प्रक्रिया, समयबद्ध निर्णय और संस्थानों की व्यावहारिक कठिनाइयों का समाधान भी जरूरी है।
नए विश्वविद्यालयों के लिए राहत, पुराने संस्थानों पर नियमों का बोझ?
डॉ. अग्रवाल ने राज्य सरकार की नीतियों पर भी सवाल उठाते हुए कहा कि एक ओर नए निजी विश्वविद्यालयों की स्थापना को आसान बनाने के लिए भूमि संबंधी मानकों में बदलाव तथा पांच करोड़ रुपये की स्थायी विन्यास निधि की बाध्यता समाप्त करने जैसे प्रस्ताव सामने आ रहे हैं, वहीं दूसरी ओर पहले से संचालित कॉलेजों को संबद्धता विस्तार, भूमि संबंधी मानकों, प्राभूत राशि और प्रतिवर्ष लगने वाले शुल्कों की चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है।
उनके अनुसार, संस्थानों के लिए प्राभूत राशि 15 लाख रुपये और व्यावसायिक पाठ्यक्रमों के लिए 35 लाख रुपये तक होने तथा हर वर्ष प्रक्रिया एवं संबद्धता शुल्क जमा करने की व्यवस्था से आर्थिक दबाव बढ़ता है। ऐसे में उच्च शिक्षा के विस्तार और संस्थानों को सुचारु रूप से संचालित करने के सरकारी दावों की व्यावहारिकता पर विचार करना आवश्यक है।उन्होंने कहा कि यदि नए विश्वविद्यालयों के लिए नियमों में राहत दी जा सकती है, तो वर्षों से शिक्षा के क्षेत्र में कार्य कर रहे निजी एवं अशासकीय संस्थानों की समस्याओं के समाधान के लिए भी समान संवेदनशीलता दिखाई जानी चाहिए।

मुख्यमंत्री, शिक्षा मंत्री और कुलपति को भेजा जाएगा पत्र
डॉ. सुनील अग्रवाल ने बताया कि निजी कॉलेज एसोसिएशन उत्तराखंड विश्वविद्यालय के इस आदेश पर पुनर्विचार करने तथा संबद्धता विस्तार की प्रक्रिया को समयबद्ध बनाने की मांग को लेकर कुलपति, मुख्यमंत्री और शिक्षा मंत्री को पत्र भेजेगा।
एसोसिएशन की मांग है कि संबद्धता विस्तार के लंबित मामलों का शीघ्र निस्तारण किया जाए, शुल्क व्यवस्था की समीक्षा हो और संस्थानों पर ऐसा आर्थिक बोझ न डाला जाए जिससे उनका संचालन कठिन हो जाए।उन्होंने कहा कि शिक्षा संस्थानों से शुल्क लेने में तत्परता और उन्हें संबद्धता देने में देरी—यह व्यवस्था उच्च शिक्षा के हित में नहीं हो सकती। सरकार और विश्वविद्यालय को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि नियमों का उद्देश्य शिक्षा व्यवस्था को मजबूत करना हो, न कि संस्थानों के सामने ऐसी परिस्थितियां खड़ी करना जिनमें उनका संचालन ही मुश्किल हो जाए।—


